Reporter: Rajendra Shekhawat
21 Jan, 2017
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चित्तौडग़ढ़: नवाबों की नगरी निम्बाहेड़ा, जहां अपनी अदब और भाईचारे के लिए जानी जाती थी, अब इसी शहर में जुए और सट्टे की चमक-दमक से चुंधियाकर आम आदमी भी आकर्षित हो रहे हैं। नवाबों की नगरी में सट्टे के इस कारोबार में जहां आम और गरीब लोग पिसते चले आ रहे हैं, वहीं सट्टा चलाने वाले कारोबारियों ने कई घर उजाड़कर रख दिए हैं। ये कारोबारी अब धार्मिक, राजनैतिक और सामाजिक संगठनों से भी जुड़ गए हैं और इस कारण इनके खिलाफ कार्यवाही भी नहीं होती है।


निम्बाहेड़ा के सट्टे से प्रभावित लोगों के साथ आए दिन होने वाली आत्महत्याओं, गोलीबारी की घटनाओं और हत्या के प्रयासों के मामले देखे जा सकते हैं, जो इसी अवैध कारोबार के खामियाजे के रूप में सामने आ रहे हैं। सट्टे का ये कारोबार इतना फैल चुका है कि इससे सैकड़ों घर बर्बाद हो चुके हैं और कई लोग तो कर्ज, ब्याज और शराब के अंधेरे में डूब गए हैं। इस अवैध कारोबार के खामियाजे की भरपाई समाज की नई पीढ़ी को अप्रत्यक्ष रूप से चुकानी पड़ रही है। कुल मिलाकर सट्टे की चमक-दमक ने कई घरों के उजाले छिन लिए हैं।
घंटो के हिसाब से होता है फाइनेंस


निम्बाहेड़ा में चलने वाला सट्टा कारोबार ऐसे ही संचालित हो रहा है, जैसे बिना धुएं की फैक्ट्री संचालित हो रही हो। यह कारोबार बकायदा शिफ्टों में चलता है और बाहर से आने वाले जुए और सट्टे के खिलाडिय़ों की सुविधाओं का ध्यान रखा जाता है। इन सुविधाओं में फाइनेंस की सुविधा भी उपलब्ध होती है और यह फाइनेंस घंटो और दिनों के हिसाब से ऊंची ब्याज दरों पर उपलब्ध होता है। जहां जुऐ और सट्टे का यह अवैध कारोबार संचालित होता है, वहीं बकायदा फाइनेंसर भी अपना कारोबार चलाते हैं और फाइनेंस का यह कारोबार उसी तरह संचालित है, जैसे वैद्य लाइसेंसी कारोबार संचालित होता है। कई बार तो जुए व सट्टे के खिलाडिय़ों को आनन-फानन में फाइनेंस उपलब्ध कराया जाता है और रूपया नहीं चुकाए जाने की स्थिति में आए दिन अपहरण और मारपीट यहां तक कि हत्या के प्रयास जैसे हालात भी पैदा हो जाते हैं। सटोरियों के सरगनाओं के इस साम्राज्य में बकायदा डॉन किस्म के लोग भी होते हैं जो इन लोगों से वसूली का काम करते हैं।


सटोरियों से पुलिस की गलबहियां
ऐसा नहीं है कि सट्टे और जुए के इस साम्राज्य की जानकारी पुलिस और प्रशासन को नहीं है, बल्कि पुलिस के कांस्टेबल से लेकर आला अधिकारी तक एक-एक स्थान पर संचालित होने वाले सट्टे और जुऐ के कारोबार की जानकारी है और पुलिस व राजनैतिक सरंक्षण में ही ये सट्टा संचालित हो रहा है। हालात ये है कि सट्टा और फाइनेंस कारोबारियों के साथ कई पुलिसकर्मियों को गलबहियां करते भी देखा जा सकता है और इसी कारण इन सटोरियों के हौंसले इतने बुलंद है कि खुलेआम सड़कों पर जुआ-सट्टे के दाव लगाते और घोड़ीदाना खिलवाते नजर आते हैं। पुलिस की मिलीभगत और सटोरियों से लेन-देन के हिसाब में भी पूरी तरह पारदर्शिता बरती जाती है। ये रिश्वत की राशि नकद के अलावा अन्य स्त्रोतों से भी पहुंचाई जाती है। पुलिसवालों को गिफ्ट के रूप में कपड़े, जुते, मोबाईल रिचार्ज आदि से भी उपकृत किया जाता है, यानि लेन-देन की प्रक्रिया के हिसाब का पूरा-पूरा हिस्सा उन तक पहुंच जाता है। इन सटोरियों पर न तो आयकर विभाग की कार्यवाही होती है और न ही कोई टैक्स लगता है।


चमक-दमक से आकर्षित होती युवा पीढ़ी
जुए और सट्टे के इस कारोबार में शामिल लोगों के रहन-सहन, चमचमाती गाडिय़ों, ब्याजखोरों के बंगले और उनके द्वारा अय्याशी के लिए खर्च किए जाने वाले रूपयों को देखकर युवा पीढ़ी इस ओर आकर्षित होती है। सट्टे के इस दलदल में कई नौजवान और पढऩे वाले बालक तक फंस चुके हैं और अब कई युवाओं को तो इन सटोरियों ने बकायदा नौकरी पर रख लिया है, यानि सट्टे के इस काले कारोबार में अवयस्क बालक तक जुड़ चुके हैं।

कई बने धार्मिक नेता, तो कईयों को राजनैतिक सरंक्षण
शहरभर में कई स्थानों पर चलने वाले सट्टे और जुए के इस कारोबार के सरगना या तो धार्मिक नेता बनकर अपनी दुकान चला रहे हैं या फिर उन्हें राजनैतिक सरंक्षण प्राप्त है। खासतौर पर जब-जब भी सट्टा कारोबार पर सख्ती होती है या उस पर आंच आती है तो शहर का अमन खत्म होने लगता है और आए दिन साम्प्रदायिक घटनाएं बढ़ जाती है। शहर में होने वाली छोटी-मोटी चोरी और अन्य अपराधों की तह में जाने पर प्रमुख कारण सट्टा और जुए का कारोबार ही सामने आता है। जहां एक ओर पुलिस और प्रशासन भी इन सटोरियों के सामने नतमस्तक है, वहीं निम्बाहेड़ा में जिले ही नहीं, बल्कि दूसरे जिलों और अन्य प्रदेशों से बर्बाद होने के लिए खिलाड़ी आते हैं।


प्रयास हुए लेकिन होते हैं विफल
निम्बाहेड़ा कस्बे में जब भी कोई नया पुलिस या प्रशासनिक अधिकारी आता है तो सटोरियों पर नकेल कसने की कोशिश की जाती है, लेकिन थोड़े ही दिनों में ये अधिकारी इन्हीं कारोबारियों में घुलमिल जाते हैं। कभी-कभार औपचारिकता के लिए हफ्ते-पंद्रह दिनों में दो-चार सटोरियों को पकड़कर खानापूर्ति कर ली जाती है। पिछले कई सालों से फूल रहे इस कारोबार में राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता और कई धार्मिक नेता भी शरीक है और इससे यह कारोबार भी कौमी-एकता की मिसाल की तरह बनता जा रहा है, लेकिन जब-जब भी सट्टे के कारोबारियों पर कार्यवाही की गई तो शहर की कौमी-एकता खतरे में आ जाती है। कई बार इस कारोबार के विरूद्ध अभियान चलाया गया, लेकिन थानास्तर के अधिकारियों की इच्छाशक्ति तक जवाब दे गई, क्योंकि सिस्टम में ऊंचे रसूख और भ्रष्टाचार का आलम यह है कि निचले स्तर के अधिकारी इसी सिस्टम का हिस्सा बनकर रह गए।


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