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22 Oct, 2016
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    दुर्ग `दीपावली पर मात्र घरों की सफाई ही जरूरी नहीं है, मन और हृदय की सफाई भी उतनी ही जरूरी है। मन और हृदय को दुर्गुणों से मुक्त करें, स्वच्छ करें और नैतिकता, शांति और विवेक के दीप प्रज्ज्वलित कर दीपावली मनाएं। आत्मा को उन्नत और समुन्नत बनाने का पुरूषार्थ करें। अन्तरात्मा की शुद्धि भी स्वच्छता अभियान ही है। उक्त विचार आज चातुर्मास प्रवचन श्रृंखला में मुनि मनितप्रभसागर ने व्यक्त किए।
    ऋषभ नगर, दुर्ग में तपस्वियों और श्रावक-श्राविकाओं को सम्बोधित करते हुए मुनिश्री ने कहा कि परमात्मा महावीर के निर्वाण के बाद देवों ने अष्टद्रव्य से युक्त मिट्टी के दीप प्रज्ज्वलित कर शोकग्रस्त समाज को जागृति का सन्देश देकर दीपावली मनाई। समाज को अपनी बुराइयां, कमजोरियां और हृदय के अंधकार को दूर करने की पे्ररणा दी। मुनिश्री ने कहा कि नैतिकता, शांति और विवेक के दीपों के प्रज्ज्वलन से सजी दीपावली जरूरी है। आत्म जागृति कर विवेकवान बनें। विवेक के बिना नैतिकता और शांति सम्भव नहीं। आत्मा की उन्नति के लिए अपनी शक्ति भर पुरूषार्थ करें।
    मुनिश्री ने कहा कि सरस्वती और लक्ष्मी का वास स्वच्छता में ही हैं। दीपावली पर अपने घरों की सफाई करें। एकत्रित कचरा साफ करें किन्तु उसे दूसरों के घर के सामने न डालें। सफाई के लिए, जीवन के लिए उपयोगी जल का मितव्ययता से प्रयोग करें। एकत्रित कचरा कूड़ादान में डाले। मुनिश्री ने कहा कि सफाई के दो प्रकार है, आत्मा की, हृदय की सफाई और द्रव्य की सफाई। द्रव्य की सफाई से भी अधिक महत्वपूर्ण है आत्मा की हृदय की सफाई। हृदय को बुराईयो, स्वार्थ, राग-द्वेष, शरीर के रख-रखाव के प्रति राग, संबंधों में रागी भाव, क्रोध, माया-लोभ आदि कषायों से मुक्त कराना भी जरूरी है। मन को समता, सद्भाव, पे्रम, अहिंसा आदि गुणों से युक्त कर पुण्यधन एकत्रित करें। अनावश्यक पदार्थों के प्रति परिग्रह भाव से बचें। निरन्तर क्षय हो रहे पुण्यों का अर्जन करें और बढ़ रहे पापरूपी खर्चों को नियंत्रित करने पुरूषार्थ करें। जन्म के साथ ही क्षय हो रहे पुण्यों को पुन: संचित करने के साथ इस भव को सुधारें और अगले भव को संवारें।
    मुनिश्री ने कहा कि हम जैसे हैं वैसे ही दिखें। अन्तर में और बाह्य रूप में किसी प्रकार का भेद न होने दें। विवेकपूर्ण धैर्य की जिन्दगी जिऐं, धर्ममय जीवन जीऐं। धर्म की जिन्दगी ही शांति पूर्ण जीवन है। धर्माचरण से ही होंठों पर हंसी और हृदय में विस्मति संभव है। उन्होंने कहा कि ऊँचे विशाल पर्वतों पर पानी नहीं ठहरता। सहजता और सरलता से युक्त विनम्र तालाब और नदियाँ ही जल को ग्रहण करती है। मन को हृदय को प्रसन्नता से आनन्द से भरकर परमात्मा के प्रति, गुरूजनों के प्रति समर्पण और श्रद्धाभाव से जुड़ें। जीवन मर्म ओर धर्म के रहस्य को समझें।
    आज सभा में 23 अक्टूबर को सुबह 5.20 बजे श्रावकों को विशेष पूजा हवन के लिए पूजा वस्त्रों में उपस्थित रहने का निर्देश मुनिश्री ने दिया। सभा को 23 अक्टूबर सुबह 8.30 बजे आचार्यश्री जिनमणिप्रभसूरि के सूरिमंत्र प्रथम पीठिका साधना की समाप्ति पर विशेष विधान एवं जुलूस में शामिल होने के लिए श्रावक-श्राविकाओं को आमंत्रित किया गया। प्रवचन वाटिका में गच्छाधिपति आचार्यश्री जिनमणिप्रभसूरिजी के सानिध्य में दीक्षा कायक्रम एवं महामांगलिक आयोजन की सूचना दी गई। सभा में बताया गया कि आचार्यश्री की कल्याणकारी साधना की निर्विघ्न सफलता के लिये 22 अक्टूबर को श्रावक-श्राविकाओं द्वारा 9 लाख नवकार मंत्रों का जाप किया जाएगा। मंत्र जाप का यह कार्यक्रम दिनभर जारी रहेगा। प्रतिदिन किया जाने वाला सवा लाख नवकार मंत्रों का जाप आज भी जारी रहा। सभा में आज खरियार रोड से पधारे कांतिलाल लोढ़ा ओर धानुबाई जैन का तथा चेन्नई से आए मनोज गोलेच्छा का सम्मान लाभार्थी मिश्रीलाल लोढ़ा परिवार द्वारा किया गया। सभा में सैंकड़ों की संख्या में श्रद्धालुओं ने प्रवचन का लाभ लिया।
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